Hindi poem on exhortation
उद्बोधन By सत्येन्द्र नारायण सिंह ओ, कलम पकड़ने वाले! हाथों में पकड़ो तलवार कभी। यदि कोई हक छीन रहा, या करना चाहे वार कभी।। धर्म और न्याय-भाषण से, काम नहीं जब बन पाए, दुर्बल,वृद्ध और अबला को, दुर्जन कोई आँख दिखाए, तो खींच धनुष की प्रत्यंचा, कर वाणों की बौछार कभी। ओ, कलम पकड़ने वाले! […]

उद्बोधन
By सत्येन्द्र नारायण सिंह
ओ, कलम पकड़ने वाले!
हाथों में पकड़ो तलवार कभी। यदि कोई हक छीन रहा,
या करना चाहे वार कभी।।
धर्म और न्याय-भाषण से,
काम नहीं जब बन पाए,
दुर्बल,वृद्ध और अबला को,
दुर्जन कोई आँख दिखाए,
तो खींच धनुष की प्रत्यंचा,
कर वाणों की बौछार कभी।
ओ, कलम पकड़ने वाले!
हाथों में पकड़ो तलवार कभी।।
राष्ट्र और प्रदेश स्तर पर,
धार्मिक अड़चन यदि आए,
लाखों के हित की रोटी को,
कोई अकेले ही खाए,
कर दे कृतार्थ निज जीवन को, बन जा कल्कि अवतार कभी।
ओ, कलम पकड़ने वाले!
हाथों में पकड़ो तलवार कभी।।
स्वार्थ-निहित यद्यपि जीवन,
फिर भी परमार्थ कमाओ,
निज गृह उजड़े नहीं किंतु,
बेघर को कहीं बसाओ,
‘सत्येन्द्र’ गुलों के बदले में,
अच्छा लगता है खार कभी।
ओ, कलम पकड़ने वाले!
हाथों में पकड़ो तलवार कभी।।
-सत्येन्द्र नारायण सिंह
Related from Culture

Asmi Aderay, the Hyderabad-to-LA singer who refuses to pick one genre

From Apu to authenticity: how the diaspora took back its image on screen

Streaming the diaspora: how Netflix let the second generation tell its own story



